सरोकार

Just another weblog

185 Posts

629 comments

Dr. Gajendra Pratap Singh


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by: Rss Feed

एक दिन मयखाना फ्री हो जाए….??????

Posted On: 25 Jan, 2017  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

में

0 Comment

प्रधानमंत्री् जी जरा इन पर गौर कीजिए

Posted On: 11 Nov, 2016  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

में

2 Comments

दंगें की आग……… एक कहानी…..

Posted On: 20 Mar, 2014  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

1 Comment

थोड़ा व्‍यस्‍त हूं

Posted On: 17 Mar, 2014  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

0 Comment

मीडिया में महिला खबरें गौण

Posted On: 17 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Junction Forum Others Others social issues में

2 Comments

गंदगी से बू आने लगी………

Posted On: 13 Nov, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Junction Forum Others social issues न्यूज़ बर्थ में

7 Comments

सोच – महिलावादी

Posted On: 29 Oct, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

3 Comments

भय और आस्था की हकीकत

Posted On: 20 Oct, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others Others social issues न्यूज़ बर्थ में

0 Comment

क्यों जलाते हो रावण को …………..

Posted On: 14 Oct, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

1 Comment

Page 1 of 1912345»10...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

आदरणीय गजेंद्र जी, जिन महिलावादी संगठनों की बात आपने उठाई है उन पर आपके ही मर्द समाज का वर्चस्व है या ऐसी महिलाएं उसे चला रही हैं जिनकी डोर किसी न किसी मर्द के हाथ में है। यकीनन ऐसे संगठन महिलाओं को भरमाने के सिवा और क्या दे सकते हैं। महिलावादी संगठन की आड़ में ये महिलाओं को मर्दों के चक्रव्यूह में फंसाने का काम ही अधिक करते हैं। किसी भी पुरुष नियामक द्वारा बनाई गई नियमावली कैसे स्त्रियों को न्याय दे सकती है? अब स्त्री मर्दों से आजादी की याचना नहीं करेगी बल्कि वह अपने नैसर्गिक अधिकार का वरण करेगी। अतः किसी दुविधा में न रहें तथा औरतों को कुचक्रयुक्त नैतिक शिक्षा देने से परहेज करें।

के द्वारा: Anita Paul Anita Paul

हैलो gpsingh.jagranjunction.com और आपकी जानकारी के लिए धन्यवाद - मैं निश्चित रूप से यहीं से कुछ नया उठाया है लेकिन मैं विशेषज्ञता कुछ तकनीकी मुद्दों मैं करने के लिए पिछले वेब साइट लाट के बार पुनः लोड करने के अनुभव के बाद , इस वेब साइट का उपयोग किया था मैं अपने होस्टिंग ठीक है अगर यह ठीक से मैं सोच रहा था लोड करने के लिए मिल सकता है ? मैं शिकायत कर रहा हूँ , लेकिन सुस्त लोड उदाहरणों समय अक्सर गूगल में अपने स्थान को प्रभावित करेगा और ऐडवर्ड्स के साथ विज्ञापन और विपणन वैसे भी मैं अपने ईमेल करने के लिए इस आरएसएस जोड़ रहा हूँ और अपने से अधिक के लिए बाहर देखो सकता है अगर आपके गुणवत्ता स्कोर को नुकसान पहुंचा सकता है ऐसा नहीं है कि संबंधित रोमांचक सामग्री आप जल्द ही फिर से इस अद्यतन सुनिश्चित करें कि

के द्वारा:

के द्वारा: Bhagwan Babu 'Shajar' Bhagwan Babu 'Shajar'

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

गजेंद्र जी, सादर नमस्कार. दिल्ली के इस इंद्रप्रस्थ पार्क से मेरा भी परिचय हो चुका है लेकिन आपकी ही तरह. डॉक्टर साहब, मैं तो कहता हूँ ये तो बस एक शुरुआत है. अभी आगे-आगे देखिये होता है क्या ? पूरे देश ने भारतीय संस्कृति और विचारों को जंग लगा हुआ घोषित कर दिया है. फिल्मों में बेढंगे रोल करने वाले भांड हमारे आदर्श हो चुके हैं. हमारे युवाओं ने कसम खा रखी है के जब तक पूरे भारत को योरोप नहीं बना देंगे शांत नहीं बैठेंगे. इंद्रप्रस्थ पार्क जैसा दृश्य तो अब छोटे और मध्यम दर्जे के नगरों में भी दिखाई देने लगा है. मुझे नहीं लगता के गंगा अब पहाड़ चढ़ेगी . लेकिन इतने प्रभावी लेख के लिए आपको बधाई. नमस्कार..

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

आदरनीय गजेन्द्र जी, सबसे पहले आपको मेरी तरफ से ” बेस्ट ब्लोगर ” चुनने के लिए बहुत बहुत बधाई! गजेन्द्र जी, मैं भी आदरणीय अशोक दूबे जी के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ, इसके अलावा अपने देश की न्याय ब्यवस्था को भी मैं दोषी मानता हूँ. सभी चर्चित कांडों को सिर्फ चर्चित बनाकर, त्वरित अदालतें बनाकर तत्काल मामले को रफा दफा कर दिया जाता है, और फिर शुरू हो जाती है धीमी रफ़्तार के साथ चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया. अगर इन अपराधियों को जल्द और कठोर सजा दे दी जाय जो जग जाहिर भी हो तो शायद इन अपराधों पर अंकुश लग सके! बहरहाल सामयिक आलेख लिखने के लिए पुन: अभिनन्दन! जागरण को गलती सुधारनी चाहिए, वो तो कुमारेन्द्र जी ने यहाँ जाहिर कर अपने लेखकीय धर्म का पालन किया है! उनका भी अभिनन्दन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

गंजेंद्र जी सबसे पहले आपको बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर हार्दीक बधाई .महिला उत्पीडन के सम्बन्ध में आपने बहुत विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया है और यह आज की सच्चाई है सिर्फ! आपके एक विचार से मैं सहमत नहीं हूँ की यह सब पुरुष प्रधानता के चलते हो रहा है यह गुजरे ज़माने की बात आप कर रहें हैं पुरुष प्रधानता अपने देश में सदियों तक रही है पर आज कई शीर्ष पदों पर महिला भी काबिज हैं हाँ चुकी आबादी अपने देश की इतनी है की सबको समान सुविधा उपलब्ध नहीं है क्यूंकि साधन सीमित हैं जो सब तक पहुच नहीं रहे और उसपे भ्रष्टाचार भी हावी है और जहाँ तक महिलाओं के प्रति जुल्म की बात है तो आप भी जानते होंगे जायदातर महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन हैं कभी सास के रूप में कभी वैश्यावृति को चलाने के रूप में वैश्यावृति जिसको उनकी भाषा में चकला कहते हैं उसकी मालकिन हमेशा महिला ही होती है और सबसे गंभीर यह बात है की भ्रूण हत्या के लिए एक महिला ही तैयार हो जाती है वर्ना पुरुष कभी जोर जबरदस्ती से कन्या भ्रूण हत्या नहीं करने को विवश करता एक आध अपवाद को छोड़कर और ऐसी हत्यायें केवल इसलिए होती हैं क्यूंकि अपने हिन्दू विवाह कानून में सम्पति के अधिकार एक पुरुष को ही दिया जाता है उत्तराधिकारी अभी तक कोई महिला नहीं हुयी और एक वंश परमपरा की बात भी है लोग ऐसा मानते हैं लड़का नहीं हुवा तो मेरे वंश का क्या होगा? वह तो समाप्त हो जायेगा और अकूत सम्पति को कौन भोगेगा ऐसा ज्यादातर अमीर लोगों में होता है गरीब लोगों में इसलिए भी दोहरा ब्यवहार होता है क्यूंकि अपना समाज दहेज़ प्रथा में बुरी तरह उलझा है लड़की पैदा होते ही लोगों को उसके दहेज़ इकठ्ठा करने की चिंता सताने लगती है जिस दिन अपने समाज से दहेज़ प्रथा जैसी कुप्रथा समाप्त हो जाएगी ऐसे जुल्म भी महिलाओं एवं बेटियों पर नहीं होंगे ऐसा मेरा मानना है

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

सच तो ये है कि आज के युवाओं का कोई आदर्श ही नहीं है और ना ही कोई सिद्धांत , जैसे हर हफ्ते फिल्म के पोस्टर बदलते हैं ठीक वैसे ही उनके आदर्श और सिद्धांत ! संस्कार रहित , अपनी मस्ती में मस्त , घर-परिवार , समाज से कोसों दूर .... भेड़चाल के शिकार , उत्तेजना से लबरेज , सब्र का अभाव , मरने - मारने को सदैव तत्पर , विदेशी कल्चर का तेजी से अनुशरण करने वाला ! अपने हांथों से अपने 5000 बर्ष पुराने कल्चर और अपने भविष्य को खत्म करने वाला , और कोई नहीं आज का युवा ही है ! वो बिगड़े हुए युवा ही थे जिन्होंने दिल्ली और गुवाहाटी में इस देश को शर्मसार किया है ! आज देश में बढ़ते अपराधों में सबसे ज्यादा प्रतिशत युवाओं का ही है ! हमारे बीच क्लबों का बढ़ता हुआ चलन , ड्रग्स , शराब , लेट नाईट पार्टियाँ , जिस्मफरोशी इन सभी के पीछे आज का भटका हुआ युवा ही है ! ऐसा नहीं है की देश का सभी युवा वर्ग यही सब कर रहा है ! इस देश में ऐसे भी नौजवान हैं जो आज भी अपने देश पर मर मिटने को सदैव तत्पर रहते हैं , ऐसे भी युवा हैं जो समाज को सुधारने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं !

के द्वारा:

कहना गलत न होगा कि, मीडिया में ध्वस्त होते नैतिकता के मानदंड इतने प्रभावित हो चुके हैं कि उसमें सूचना का यथार्थ अपने-अपने हितों को साधने के कारण बदल जाता है। ज्याॅ बोद्रिया के शब्दों में, ‘‘मीडिया शब्द, दृश्य और अर्थ को ध्वस्त करके उन्हें पुनर्निर्मित करता है ताकि इच्छित प्रभाव उत्पन्न किया जा सके। मीडिया हमारे और यथार्थ के बीच मध्यस्थता करता है और यह मध्यस्थता हमारे लिए यथार्थ को अधिक-से-अधिक अवमूल्यन करती है। क्योंकि, लक्ष्मण रेखा के उस पार सफलता का उजाला नहीं बल्कि असफलता का जिल्लत भरा अंधेरा है।’’ क्या हमारे देश के पत्रकार और मीडिया ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड्’ के अंजाम से कुछ सबक लेंगे? उनका जो हो सो हो, पर सवालों से घिरा भारतीय मीडिया इस दुर्घटना से सबक क्या लेता है? ‘‘पिछले दो दशकों के दौरान हमारे मीडिया ने भी लक्ष्मण रेखा को लगातार लांघा है। मीडिया को व्यवसाय मानने में कोई हर्ज़ नहीं है, परंतु हर पेशे की अपनी नैतिकता होती है और नैतिकता के अपने ही मानदंड। क्योंकि इनका निर्वाह ऑक्सीजन की तरह है, जिसके बिना जिया नहीं जा सकता। ये मानदंड इधर के सालों में लगतार टूटे हैं। यह चिंता की बात है।’’आज मीडिया इस तरह से हावी हो चूका है की सही को गलत और गलत को सही करने में बस एक दिन लगता है ! बहुत सटीक लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

आदरणीय डॉ. गजेन्द्र प्रताप सिंह जी, महानगरों में नीचों के कुकृत्य सारी हदें पार कर चुके हैं | आप का आक्रोश समझ में आता है, फिर भी आप द्वारा सुझाई गई सज़ा न तो न्यायिक है और न ही संवैधानिक | ऐसे आक्रोश से कठोर सज़ा की मुहिम कमज़ोर पड़ती है | बलात्कार के अपराधियों को सिर्फ और सिर्फ फाँसी की सज़ा होनी चाहिए | अब इस सन्दर्भ में भारतीय जनता को एक स्वर से फाँसी की सज़ा की माँग करनी चाहिए | वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! " बलात्कार के दोषियों को फांसी देने के वजह उनका लिंग काट देना चाहिए और उनके माथे पर लिख देने चाहिए कि मैंने बलात्कार किया था और सजा के तौर पर मेरा लिंग काट दिया गया। "

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

सुझाव अच्छा है , पर एक बात सोचें कि हम उस देश के नागरिक हैं जहाँ कि संसद कि साथ बलात्कार होता है ...पूरे देश के साथ बलात्कार होता है ................देश कि अस्मिता के साथ बलात्कार होता है और एक दो बार नहीं जब- तब होता है .................और हमारी सरकार में बैठे लोग सिर्फ तमाशा देखते हैं ........कुछ करते नहीं सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाते हैं ......... अम्रेरिका की और एक बार आंख उठाकर देखा गया ......अफगानिस्तान तबाह हो गया...पूरा देश. !!!!!!! दोबोरा कोशिश करने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा. मगर हमारे देश में इस रोज का काम है ........ वह तो बलात्कार करने वाले किसी राजनेता के वंशज नहीं है वरना अभी तक तो पीड़ित लड़की की बखिया उखाड़ी जाने लगती .....कोई शोर शराबा नहीं होता. ....... ऐसे पंगु कानून में जो हो सकता है वही हो रहा है ....किसी हो कोई भय नहीं है .............

के द्वारा: Ashish Mishra Ashish Mishra

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

आपके बच्चे कितने हैं? और जवाब में उसने हमें एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। हम गाल सहलाते हुए अपने गुरू के पास पहुंचे तो उसने हमें हमारी बेवकूफी समझाई, और कहा, ‘‘इस बार कोई गलती मत करना,’’ हमने वादा किया और चल पड़े एक दूसरी सुंदर महिला की तरफ। हमने उसे मुस्कुराकर देखा, महिला ने भी हमें मुस्कुराकर देखा। हमने उसे अपना नाम बताया फिर उसने भी हमें अपना नाम बताया। फिर हमने पूछा, ‘‘आपके बच्चे कितने हैं? उसने जवाब दिया, मेरे दो बच्चे हैं।’’ अचानक हमें याद आया कि हम इससे पहले का एक सवाल पूछना भूल गए हैं। और हमने तुरंत वो सवाल भी पूछ लिया, आपकी शादी हो गई है क्या? तड़ाक….. महिला का थप्पड़ हमारे गाल पर पड़ा। हम रोते हुए फिर दोस्त के पास पहुंचे और इससे पहले कि हम कुछ बताते, हमारे दूसरे गाल पर दोस्त का थप्पड़ पड़ चुका था, तड़ाक…..।आप जिस लेखन के लिए जाने जाते हैं , ये वो तो नहीं है श्री गजेन्द्र प्रताप जी ! आपसे हमेशा बेहतर और मौलिक लिखने की उम्मीद करी जाती है लेकिन इस बार मुझे निराशा हुई !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

भारत में फांसी देने के लिए रस्सी केवल बक्सर (बिहार) की सेन्ट्रल जेल में बनती है और ऐसा आज से नहीं ... 1844 से हो रहा है। आजादी के बाद भी जितनी फांसी हुई सभी की रस्सी केवल बक्सर जेल में बनी और वहां से कोई भी रस्सी कसाब के लिए बनी ही नहीं। न तो सरकार ने आदेश दिया कि रस्सी तैयार करके भेजो और न ही रस्सी भेजी गयी। बिहार जेल विभाग के निदेशक एसबी सिंह का कहना है कि "हमने आखिरी बार 2007 में आदेश मिलने पर दिल्ली के तिहाड़ जेल में अफजल गुरु को फांसी के लिए एक विशेष रस्सी की आपूर्ति की थी और हमें कसाब की फांसी के लिए रस्सी तैयार करने का कोई आदेश नहीं मिला। " फिर कसाब को क्या मकड़ी के जाले से लटकाया गया ?? क्या यह इस बात को नहीं सिद्ध करता कि बीमार कसाब की मृत्यु डेंगू से हो गयी और वाहवाही लेने के लिए उसकी मौत को फांसी का नाम दिया जा रहा है??

के द्वारा: आनन्द प्रिय राहुल आनन्द प्रिय राहुल

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

सराहनीय विश्लेषण गजेन्द्र जी । वहाँ-यहाँ के फ़र्क को समझने के लिये समलैंगिकता के पैरोकारों को खुद से मात्र एक प्रश्न किये जाने की ज़रूरत है । वह ये कि दुर्भाग्य से उनकी खुद की कोई संतान यदि खुलेआम समलैंगिक हरक़तें करते हुए पड़ोस या कहीं के भी समलिंगी पार्टनर के साथ ब्याह रचाने की ठान ले, तो क्या वे पश्चिमी समाज के माता-पिता की भाँति सामान्य सहमति दे पाने का साहस जुटा पाने की क्षमता रखते हैं ? यदि उनका उत्तर ईमानदारी के साथ 'हाँ' में हुआ, तो हमें ये मान लेना चाहिये कि हमारा समाज अब सचमुच तथाकथित रूप से 'आधुनिक' हो चुका है । वकील जिनकी दलीलों पर फ़ैसले का निर्धारण होता है, तथा मीडिया के लिये, यही कहा जा सकता है कि दोनों ही अपने-अपने मुवक्किलों के हितों के हिसाब से चलते हैं, जिसमें खुद उनका अपना निहितार्थ छुपा होता है । वकील को अपने मुवक्किल समलैंगिकों का केस जीतने से मतलब है, तो मीडिया को मसालेबाजी से । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय गजेन्द्र प्रताप जी, नमस्कार! आपने कमोबेश सही तस्वीर रक्खी है मीडिया भी आजकल सरकारी विज्ञापन और संरक्षण के लालच में सर्कार का गुण गाता दीखता है, पर सभी वैसे नहीं हैं, इस मीडिया के वजह से ही हम बहुत सारी चीजों को जान पाते हैं, जो आम आदमी के लिए दुर्लभ है. मीडिया ने अन्ना, रामदेव, से लेकर केजरीवाल तक को भी बखूबी दिखाया और प्रचारित किया है, घोटालों को भी उजागर करने में बहुत हद तक रोल निभाया है. प्रणव मुखर्जी के बेटे का अपने पिता की सीट पर बहुत कम अंतर से जीतना जनता में जागरूकता का परिचायक है ... पर जनता क्या करे एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई दीखता है. सही विकल्प अगर मौजूद हो तो कांग्रेस का जाना तय है यह मेरा मानना है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

गजेन्द्र जी, वस्तुतः वस्त्रों को लेकर आपके द्वारा उठाये गए प्रश्न बहुत हद तक उचित हैं! यह उचित है की जिस समाज में हम रहते हैं, वहां वस्त्रों के बिना किसी भी स्त्री पुरुष को देखने की परम्परा नहीं रही है इसलिए हर मायने में यह बहुत ही अभद्र लगता है! ऐसे में उचित शायद यही हो की मुनि जी या तो आम जनता के बीच न आयें अथवा शरीर के कुछ हिस्सों को ढककर आयें ! यह भी उचित है की यदि पुरुष जैनी को सिद्ध होने के बाद वस्त्रों द्वारा शरीर ढकने की आवश्यकता नहीं तो स्त्री जैनी के लिए यही नियम क्यों नहीं? तो इस तरह के प्रश्न सभी धर्मो में उठाये जा सकते हैं क्योंकि कोई भी ऐसा धर्म नहीं जो स्त्री और पुरुष को सम्पूर्ण समानता की दृष्टि से देखता हो और उन्हें समान स्वतंत्रता और अधिकार देता हो! जैन धर्म भी इसका अपवाद नहीं बन सका है! विचारपूर्ण लेख!

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"

डॉ. गजेन्द्र जी, आपकी बात सही है बेरोजगारों को भत्ता नहीं रोजगार चाहिए, नौकरी चाहिए! लेकिन नौकरियां भी अब सिर्फ पैसे से खरीदी जा रही हैं, ऐसा लगता है 90 फीसदी क्षेत्रों में आज पैसे और पहुँच के बल पर ही नौकरियां खरीदी जा रही हैं, जो पद खाली पड़े हैं, उनके उचित खरीददारों की कमी दिखाई पड़ती होगी तभी सरकार वे पद अभी भरना नहीं चाहती! आज कल विभिन्न क्षेत्रो में (बैंक को छोड़कर)अक्सर एक-दो पदों के लिए रिक्तियां आती दिखाई दे रही है, इसमें आवेदन शुल्क भी लिया जाता है, इन सबका कारण क्या है? समझ में तो यही आ रहा है की सरकारें एक-एक पद को ज्यादा से ज्यादा पैसों में बेंचना चाहती है! आज कल बस दो क्षेत्र ही नज़र आते हैं एक बी० एड० करके टीचर बनना और दूसरा बैंक की तैयारी......युवा वर्ग अपने लक्ष्य पर अडिग नहीं रह सकता क्योंकि सबसे पहले उसे अपनी और परिवार की आधारभूत ज़रूरते जो पूरी करनी हैं! लेकिन सरकार को क्या वे तो सत्ता में अपने स्वार्थ को ही साधने आते हैं! http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/19/girlsvsboys/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

गजेन्द्र जी मैं आपकी बातों से मैं सहमत हूँ जरुर आज अभिभावक मेरा मतलब बच्चों के माता पिता से हीं है वे अपनी जिम्मेवारी से मुह मोड़ चुके हैं और नतीजा आज सामने है युवा भटक रहा है गलत रास्तों को अपना रहा है और कोई प्रतिस्पर्धा है तो वह है ,किसी तरह एक डिग्री हासिल कर ज्यादा से ज्यादा पैसे कमायें और उससे भौतिकवादी चीजों को इकठ्ठा कर शेखी बघारे मेरे पास तो एलसीडी लेटेस्ट है मेरे पास लेटेस्ट कार है मेरे पास लेटेस्ट घडी है इत्यादि इस लेटेस्ट के चलते आज युवाओं का चरित्र के प्रति कोई सहमती नहीं चाहे वह लड़का हो या लड़की सभी इस अंधी दौड़ में लगे हैं और उसी तरह बच्चों के माता पिता भी कैसे भ्रष्ट तरीके अपनाकर काली कमाई की जाये और और अपने बच्चों को लेटेस्ट चीजें मुहयिया करायी जाये और भ्रष्टचार चुकी चरम सीमा पर है साथ हीं उसके लिए कोई सजा भी नहीं है फिर क्या है जब सारे भ्रष्ट हैं उसमे मैंने थोड़ी हेरा फेरी कर ली तो क्या हुवा ?. हमारे शिक्छां संस्थाएं भी केवल कैसे प्रोफेसनल पढाई कर बच्चे जल्दी से किसी मल्टी नेशनल में ज्वाइन कर भरपूर कमाई करे यही फंडा बताते रहते हैं इसमें एक अच्छा इन्सान कोई बिद्यार्थी बने एक चरित्रवान और इमानदार नागरिक बने ऐसा किसी विद्यालय या तकनिकी संसथान में नहीं पढाया जाता, नहीं सिखाया जाता और यही सारी बुराई की जड़ है मूल कारन है आज लोगों(अभिभावकों ) का चरित्र निर्माण के प्रति उदासीनता हीं इन सारी बुराईयों को बढ़ावा देने का कारन है आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है मैंने भी कुछ अपने विचार इसमें जोड़ दिए आशा है आप भी सहमत होंगे

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

गजेन्द्र जी ,बहुत बढ़िया आलेख ,माँ बाप को अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करना चाहिए ,बेस्ट ब्लागर आफ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई! पर एक बात जो मेरे जेहन में आ रही है वह है आधुनिकता का पैमाना! बड़े शहरों की संस्कृति जो आज छोटे शहरों से होते हुए गाँव तक विकसित होने लगी है..... जैसे तुम्हारे पास किस मोडल का मोबाइल है... तुम्हारे कितने गर्ल/ बॉय फ्रेंड है ... माँ - बाप आंख मूंदे रहते हैं .... जब अति हो जाती है तब उनकी आंख खुलती है ...और आत्म हत्यायों की संख्या में जो बढ़ोत्तरी हो रही है उसमे कितने युवा वर्ग शामिल हो रहे हैं यह भी हमारी आँखों के सामने है! दोषी हम सभी हैं हमारा समाज, परिवेश इसके लिए जिम्मेदार है ... यह मेरा मानना है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: annurag sharma(Administrator) annurag sharma(Administrator)

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

ऐसे-ऐसे हजारों कारण जिसकी वजह से यह युवा पीढ़ी अपना जीवन दांव पर लगा रही है। कुछ प्यार के नाम पर, कुछ शारीरिक पूर्ति के नाम पर तो कुछ मॉर्डन दिखने-दिखाने के नाम पर। कुछ-न-कुछ तो करना होगा। जो सिर्फ और सिर्फ मां-बाप ही कर सकते हैं। पहरा नहीं बैठाइए अपितु अच्छे-बुरे में फर्क तो करा ही सकते हैं। ताकि इनका जीवन और देश का भविष्य बचा रह सके। आदरणीय श्री गजेन्द्र प्रताप सिंह जी , सादर नमस्कार ! आपका लेखन सदैव नया पण लिए होता है जिससे पढने की रोचकता बनी रहती है ! आपने अपने लेखन में सब कुछ कह दिया है , मेरे कहने लायक कुछ छोड़ा ही कहाँ है ! बस यही कहूँगा , बेहतरीन लेख ! माँ बाप शायद अपनी जिम्मेदारी समझ पाएं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

नमस्कार गजेन्द्र जी, बातें आपकी सही हैं, किन्तु दिक्कत यह है की कोई मानने को तैयार ही नहीं, लोग कहते तो बहुत हैं इसे ख़त्म करना चाहिए मगर कोई ख़त्म भी नहीं करना चाहता, इस विषय पर मैंने भी कुछ लेख लिखे जिनमे से एक में यह सुझाव दिया है कि जब तक लोग अपने नामों से जुड़े हुए जाती सूचक शब्दों को हटायेंगे नहीं तब तक यह जाती व्यवष्ठ नहीं जायेगी, राजनीतिक वर्ग तो जाती व्यवस्था को समाप्त होने नहीं देना चाहता, अब आज जनता से जो लोग जाती व्यवस्था का सफाया करने के लिए कोई कदम उठाना चाहते हैं, उन्हें जाती सूचक नाम रखने छोड़ने होंगे... फिलहाल साम्प्रदायिक दंगों पर मेरे एक लेख पर आपकी प्रतिक्रया चाहूँगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/08/18/18/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

आदरणीय गजेन्द्र जी, मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ कि 15 अगस्त 1947 को हम पूर्ण रूप से आजाद हुये थे। मेरा मानना है कि 15 अगस्त 1947 को काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता के हस्तान्तरण का समझौता हुथा था। अंग्रेजों ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया था। काँग्रेसी नेताओं का सत्ता सुख भोगने की जल्दी थी। अतः आनन फानन में समझौता कर लिया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि दुनियाँ में यह संदेश जाये कि भारतीयों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी छीनी है। अतः उन्होंने काँग्रेस के हाथों में भारत की सत्ता सौपी क्योंकि वे अंग्रेजों की शर्त मानने का राजी थे। इलहावाद के अलफ्रेड पार्क में शहीद चन्द्रशेखर आजाद को घेरने वाले कोतवाल को उत्तर प्रदेश के पुलिस कमान सौपना उन्ही शर्तों में से एक शर्त थी। इस संबंध में आप स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के आलेख पाढ़िये या उनके भाषण सुनिये। मेरा मानना है कि यह आधी अधूरी आजादी थी, यदि सच कहा जाये तो काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का एक समझौता था। फिर भी आधी अधूरी आजादी की मुबारकबाद……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

शिक्षकों तो सजा होनी चाहीये ही , पर क्या अब पत्रकार भी अपने धर्मका निर्वाह करने से पीछे नहीं हो गए हैं ?यदि पत्रकारों ने सही काम किया होता तो क्या पुलीस वाले इसे दबा सकते थे? महाभारत के अर्जुन एक मनुष्य ही थे उन्हें भगवन कृष्णन का स्सनिध्य क्यों मिला? क्योंकि उसने अपनी शिष्यआ उत्तरा, जिसे वे संगीत सिखाते थे ,वो राजा विराट की बेटी थी,,राजा विराट की बेटी को अपनी बेटी मानते हुई उससे विवाह करने के प्रस्ताव को को ठुकरा दिया था ,उनके अनुसार शिष्या तो बेटी होती है इस सोच्वालों को ही भगवान की प्राप्ति होती है ,भगवन कर्षण जी ने इसलिए ही अर्जुन को अपना मित्र माना.चर्त्र्वान होने के कारण.

के द्वारा: pitamberthakwani pitamberthakwani

के द्वारा: nishamittal nishamittal

मुद्दा वाकई बहुत ही शर्मनाक है....जहाँ तक मैं अपने मस्तिष्क की सोंच को आगे बढ़ाऊ तो इसकी शुरुआत हमारी आपकी मानसिकता ही इसकी मूल वजह है, हम यहाँ यथार्थ को स्वीकार न करके बस अपने तरीके से दूसरों को समझाने में लगे रहते है। कहते हैं कि शिक्षित वर्ग समाज कि सबसे सशक्त कड़ी है और यह एक सभ्य समाज की रचना करता है, पर क्या आज जो कुछ इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में घटित हो रहा है……क्या ये शिक्षित वर्ग जनित है …क्या यही शिक्षा प्राप्त कर रहा है हमारा समाज……..? मैं कोई दार्शनिक नहीं हूँ पर फिर भी ये कहना चाहूँगा कि इस पुरुष प्रधान देश में क्यों कोई ऐसा नियम पुरुषों के लिए बनाया जाता है जिससे इस पर अंकुश लगाया जा सके। कभी कोई नियम बना भी तो वह पूरी तरह लागू नहीं हो सका……! एक टेलीविजन एड कि ये पक्तियां मुझे इसका एक मात्र हल लगती है कि -“डर के आगे जीत है” और ये डर ही हमारे समाज से निकल सा गया है, जब तक ये डर उस विकृति मानसिकता में घर नहीं करेगा कोई सुधार नहीं होगा। हमें कुछ ऐसे नियमों को कड़ाई से लागू करना होगा जो इस समाज में उन लोगों के लिए खौफ़ का पर्याय बन जाए जो अपनी विकृति मानसिकता से इस तरह के कृत्यों को सिर्फ अपने मजे के लिए अंजाम दे रहे है। पर ये सब लागू कौन करेगा ? क्योकि यहाँ किसी को कोई सजा होती ही नहीं, हमारे देश का मानवाधिकार आयोग ही इस समस्या को खत्म नहीं होने देना चाहता है पहले तो यह उस घटना पर आँसू बहाएगा….फिर उस मुजरिम के बचाव में खड़ा हो जायेगा जिसके द्वारा कृत्य किया गया होता है……आखिर ये है क्या ? शायद यह तब तक मुम्किन न होगा जब तक भारतीय सविधान में संशोधन न हो। कहते है परिवर्तन प्रकति का नियम है जरुरत के मुताबिक परिवर्तन आवश्यक है ….पर यहाँ क्यों नहीं ?

के द्वारा:

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Dr. Gajendra Pratap Singh Dr. Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

आपका विश्लेषण सटीक और यथार्थवादी दृष्टिकोण वाला है । परन्तु बात घूम फ़िर कर वहीं आती है कि समस्या का मूल क्या है, और इसके निदान का उपाय क्या ? सारे फ़साद की जड़ हमारी चुनाव-प्रणाली है, जो भ्रष्टाचार से लेकर सारी अव्यवस्थारूपी गंगाओं की गोमुख बनी हुई है । इस बीच कुछ अच्छे प्रयास अवश्य हुए, परन्तु कुछ ईमानदार चुनाव आयुक्तों के स्तर जैसे व्यक्तिगत स्तर पर । नतीजे के रूप में चुनाव खर्चों को नियंत्रित करने जैसे कुछ अच्छे रिजल्ट आज हम अवश्य देख पा रहे हैं, परन्तु फ़िर भी असली समस्या ज्यों की त्यों मुँह बाए खड़ी है, अर्थात नेताओं की खरीदफ़रोख्त और जोड़तोड़ की राजनीति । इसके कारण राजनीतिक शुचिता भ्रष्ट से भ्रष्टतम होती चली गई । कोढ़ में खाज की तरह इस बीच क्षेत्रवाद जैसा महारोग पनपा, जिसे जातिवाद और फ़िरकापरस्ती आदि ने और भी पुष्ट किया । मामूली विश्लेषण से ही स्पष्ट हो जाता है कि अपवादों को छोड़कर शेष कोई भी चुनाव परिणाम अब जनादेश नहीं, बल्कि जुगाड़ का गठन बनकर रह गए हैं, जो कानून बनाने से लेकर देश को चला भी रहे हैं । शुचिता का माहौल बनाने का कारखाना हमारी संसद और विधानसभाएँ ही होती हैं, क्योंकि लोकतंत्र कानून द्वारा शासित होता है । जब स्रोत ही आकंठ प्रदूषित हो चुका है, तो आप द्वारा उल्लिखित शेष सारी समस्याएँ तो उसी से उत्पन्न मुख्यधारा भर हैं । आज के आंदोलनकारी इस बात को खूब समझ रहे हैं, और उनका ज़ोर चुनाव प्रणाली के सुधार पर भी खूब है, परन्तु भ्रष्टों की लामबन्दी उन्हें नाकों चने चबवा देगी ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

इस सिद्धांत को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं होती. कर्म यदि क्रिया है तो कर्मफल उसकी प्रतिक्रया. किसी क्रिया की प्रतिक्रया न हो, यह असंभव है. तो जैसा कर्म करेंगे, प्रतिक्रियास्वरूप वैसा फल तो प्राप्त होना ही है. कुछ कर्म छद्मवेशी होते है. इन्हें इस आशय के साथ किया जाता है, कि कर्मफल को कपटपूर्वक अपनी इच्छानुसार मोड़ लेंगे. परन्तु हँसी की बात ये है कि कर्मफल भी ठीक वैसा ही कपटपूर्ण आचरण अपनाता है, जैसा कि कर्त्ता ने अपनाया. वैसी ही प्रतिक्रया, जैसी कि क्रिया की गई. यानी तत्काल तो फल वैसा ही मिल जाता है, जैसा करने वाले ने चाहा, परन्तु कपट भी एक क्रिया थी, जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप कालान्तर में उसका दंडफल भी भोगना ही है. किसीके घर से गहने चुराकर बेचे, तो पैसे तो तत्काल मिल ही जाते हैं. यह चाहे जैसे भी गहने प्राप्त कर बेचने के कर्म का फल होता है. परन्तु चौरकर्म का फल भी तो मिलेगा ही, भले उसमें थोड़ी देर लगे. इसे अध्यात्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक सत्य भी मानना चाहिए.

के द्वारा: kalia kalia

हम सत्कर्म या दुष्कर्म से इस संसार में नरक को स्वर्ग या स्वर्ग को नरक में बदल सकते हैं। हमें अपने सत्कर्मों, त्याग और कठिन कार्यों से ही वैसा बन सकते है, जैसा हम बनना चाहते हैं। हम केवल अपने कर्मों से ही अपना भविष्य संवार या बिगाड़ सकते हैं। हमें इस संसार को अधिक से अधिक एवं सर्वोत्तम बातें प्रदत्त करनी चाहिए। संसार के सभी धर्म एक स्वर में भावी जीवन को सजाने-संवारने का उपदेश देते हैं। जैसा हम करेंगे, वैसा ही हमें फल मिलेगा। व्यक्ति थे पारितोषिक या उसकी सजा के मेधावी होने या उसको बुरे कर्मों से आंका जाता है। श्री गजेन्द्र प्रताप सिंह जी नमस्कार ! आज राजनीती से एकदम कट मारकर सीधे व्यावहारिक लेखन ? लेकिन बहुत सटीक और सार्थक लेख ! एक एक पंक्ति बहुत कुछ कहती है ! बढ़िया लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

काफ़ी निराशा हुई..कुछ भी नया नहीं दिखा इस बार जिससे कुछ दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों की उम्मीद की जाए. बस पुराने बजट में थोड़ा बहुत जोड़ घटाव कर दिया गया. ..वित्तीय घाटा कम करने का वित्त मंत्री का जो फोर्मुला है (सब्सिडी घटाकर) वह स्वीकार्य नहीं है, उसका कोई दूसरा तरीका होना चाहिए था जिससे की आम जनता की जरूरतमंद चीजों पर असर ना पड़े. ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं आज बहुत सोचनीय अवस्था में है लेकिन उस पर भी बहुत कम ध्यान दिया गया NRHM में नगण्य वृद्दि की गयी. आदर्श स्कूल वो भी बस 6000 क्या देश में सिर्फ इतने ही ब्लाक हैं..और पुराने स्कूलों की जर्जर अवस्था का क्या होगा..? अप्रत्यक्ष करों ने तो सचमुच पॉकेट में छेद कर दिए....

के द्वारा: Archana chaturvedi Archana chaturvedi

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

जी नमस्कार,बहुत ही सुन्दर आलेख आपने प्रस्तुत किया...निश्चित तौर पर महिलाओं की सामजिक स्थिति में गिरावट आना एक बहुत ही चिंतनीय बात है....लेकिन मुझे अपने तुच्छ सोच से ऐसा लगता है की जब से बाहरी शक्तियों ने हमारे देश पर हमले शुरू किये और युद्ध के पश्चात माँ-बहन-बेटियों के साथ दुराचार करते थे,निश्चित रूप से प्राकृतिक बनावट में स्त्रियों की संरचना पुरुषों की अपेक्षा थोड़ी कमजोर होती है,कुछ ही महिलाएं हैं जो इसका अपवाद होंगी..वे स्त्रियों को जबरन लूट कर ले जाते थे,उनके साथ व्यभिचार किया करते थे,सती प्रथा के कलंक की जननी भी यही परिस्थितियां थी...और शायद यही वह काल-खंड था,जब स्त्रियों की सुरक्षा के भय से पुरुष समाज ने उन्हें घर की देहरी तक सीमित करने की कोशिशें थी,किन्तु मानस पटल पर उन आततायी युद्धों के जख्म इतने गहरे पड़े थे कि फिर पुरानी सामजिक संरचना में लौटना बहुत कठिन होगा,लेकिन हाँ अब वैसा कोई डर नहीं है,फिर भी स्त्रियों की सामजिक स्थिति आज भी कमोबेश उसी प्रकार है,जो आज की परिस्थितियों में शर्मनाक है.यह हमारे समाज की अवनति का एक प्रमुख कारण है,हमारा समाज जड़ हो चुका है.वैसे नीच लोग अपनी माता के कोख पर कलंक हैं जो नारी के साथ सम्मान से पेश नहीं आते.

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

गजेन्द्र जी, इस सारगर्भित और तथ्यपरक विचोत्तेजक आलेख के लिए धन्यवाद्! बहूत बढ़िया. लगभग २०० साल पहले मेरी वोल्स्तान्क्रफ्त ने जो मसाल जलाई थी उसकी रौशनी अभी भी धरती के अनेक कोनों में पहुंचनी बाकी है. आपने सही लिखा है की केवल आर्थिक आज़ादी से काम नहीं चलेगा. सामजिक सोच और परंपरा में परिवर्तन भी ज़रूरी है. ख़ास कर हमारे देश और समाज में जो लोग वेद-पुराण का उदहारण देतें हैं वह भी सही है. एक उद्धरण देना चाहूँगा. क्रियती योषा मर्यतो वधुयोह परिप्रिता पन्यसा वार्येन, भद्र वधुर्भवती यात्सुपेशः स्वयं सा मित्रं वनुते जनेचित. इसका अर्थ है, कितनी स्त्रियाँ इस प्रकार की हैं जो वधु की कामना करनेवाले पुरुष से प्रशंसक वचनों और उसकी धन-सम्पदा को ही पतिवरण का माध्यम मान लेती हैं. परन्तु जो स्त्रियाँ सुशील, स्वस्थ और श्रेष्ठ मानसिक भावनाओं से युक्त हैं, वे अपनी इच्छानुकूल मित्र पुरुष को पतिरूप में वरन करती हैं. (ऋग्वेद, भात ४, मंडल १०, सूक्त २७-१२). इसी भाग में एक और उद्धरण है - सम्राज्ञी श्वसुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रवान भव, ननान्दरी सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अची देवृशु (सूक्त ८५-४६). लेकिन आज स्थिति कैसी है, यह किसी से छिपी नहीं है. मेरी वोल्स्तान्क्रफ्त के बाद सबसे धारदार कलम तसलीमा नसरीन की है जिसके खिलाफ सभी एकजुट हैं. ससक्त आन्दोलन की जरूरत है. आपने इस वैचारिक आन्दोलन को और धारदार बनाने की कोशिश की है. आशा है यह जमीनी शक्ल अख्तियार करेगी. एक बार घिर धन्यवाद्!

के द्वारा:

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: Tamanna Tamanna

मेरा निजी मत है की जो आदमी स्वयं (अपने) से प्रेम नहीं करता है वो किसी से प्रेम नहीं करता.......... प्रेम एक आंतरिक भाव है जो मनुष्य के भीतर होता है....... जब कोई ये कहता है की उसने मुझे छोड़ दिया....... और उसके दुख मे मैं मारना चाहता हूँ...... तो बड़ा दुख होता है की कोई बिना प्रेम को समझे प्रेम के लिए जान देने की बात कैसे कर सकता है...... जो प्रेम आपके भीतर है.....उस प्रेम को आपका प्रेमी / प्रेमिका छीन के ले नहीं जा सकते....... फिर उस प्रेमी प्रेमिका के जाने से आपका वो प्रेम कहाँ चला गया..... कोई अपने माँ बाप की मृत्यु पर उनके साथ मरने की बात नहीं कहता तो फिर प्रेमी प्रेमिका के लिए जान देना ....... कई बार मुझे लगता है की इस तरह की घटनाएं केवल प्रेम की मूल भावना को समाप्त करने का प्रयास है.....

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

के द्वारा: jlsingh jlsingh

मान्यवर गजेन्द्र जी, सादर. यह समस्या आधुनिकतावाद, गलत शिक्षा नीति, धन कमाने और उसका प्रदर्शन करने की मानसिकता से जुडी हुई है. संयुक्त परिवार बिखर गए हैं. एकल परिवारों की अधिकता हो गई है. जिसका कुपरिणाम वृद्धों को झेलना पड़ रहा है. परन्तु देखा जाय तो इसमें दोषी सभी हैं. बच्चों को रेस के घोड़े की तरह पाला-पोसा जा रहा है. दौड़ो, और तेज दौड़ो, सबको पीछे छोड़ दो, उस समय हम भूल जाते हैं कि इस रेस में फिर मेरा स्थान कहाँ होगा. आज जरूरत है कि हम बच्चों को शिक्षा के साथ नैतिक और पारिवारिक मूल्यों के सम्बन्ध में भी बताएं. वृद्धों, गुरुजनों, वरिष्ठों का आदर करना सिखाएं. अगर ऐसा कुछ नहीं किया जाएगा तो आखिर इसका हल क्या निकलेगा ?

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

प्रिय गजेन्द्र जी बहुत ही सुन्दर विषय आप का और सार्थक लेख -बधाई हो बच्चे अनुकरण कर बहुत कुछ सीखते हैं आप जितना ही उनको पढाओ लिखाओ वे सब भूल जो आप कर रहे हैं जैसे जी रहे हैं जिस संस्कृति तौर तरीकों के साथ उसे जरुर और जल्द सीखते हैं इस लिए हमें बहुत ही सम्मान दे , सहृदयता से , प्यार से , माँ बाप के साथ रहना है तभी आप कुछ अपने भविष्य की बात सोच सकते हैं ...और अपना किया धरा हमे मिलना भी चाहिए ....जय श्री राधे आभार भ्रमर ५ यदि नहीं कमाते है तो परिवार पर बोझ माने जाते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हम भी एक दिन वृद्ध होंगे और हमारे बच्चे भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे तो हमने अपने वृद्धों के प्रति किया। इसलिए हमें हमारी प्रवृत्ति को सकारात्मक बनाने की जरूरत है।

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

गजेन्द्र प्रतापजी , वृद्धों की समस्या पर आपका मार्मिक विश्लेषण पढ़ कर अच्छा लगा की कोई तो है जो इस विषय के बारे में सोचता और लिखता है. आपने जो बातें लिखी वे कडवी सचाई है बल्कि हकीकत बयान की है आपने. मेरे पिताश्री पूर्ण स्वस्थ रहे आजीवन परन्तु 92 साल की आयु में वे अल्ज़यिमर (alzeimer ) रोग से ग्रष्ट हुए जिसकी वजह से उनकी स्थिति दयनीय हो गयी. स्मृति विभ्रम के चलते इधर उधर निकल जाते, ऊटपटांग हरक़ते/बातें करते अतीत में चले जाते जो की इस बिमारी में अक्सर होता है. ऐसे में घर के कुछ सदस्य उन्हें डांटते फटकारते परन्तु मैं हमेशा उन्हें पूरी सहानुभूति के साथ डील करता था पर दुसरे इसे नहीं समझते थे और उल्टा मुझ पे ही नाराजगी जताते. यह मैं इस लिए बता रहा हूँ की मैं स्वयं यह सब देखा भोगा हूँ और मेरा मन्ना है की वृद्ध व्यक्तियों को अछि देखभाल, दवादारू एवं सहानुभूति की जरुरत होती है. आप बिलकुल सही फरमा रहे हैं की इस भोतिक युग में वृद्ध व्यक्ति को परिवार के लोग बोझ समझते हैं जब की उनके पास इतना बड़ा जीवन का अनुभव होता है जिस से नयी पीढ़ी (अगर चाहे तो) फायदा उठा सकती है. एक ऐसे विषय पर जिस की ओर लोगों का ध्यान बिलकुल नहीं है, उस पर लिख कर आपने उपकार किया सो आप धन्यवाद के पात्र हैं. oppareek43.jagranjunction.com

के द्वारा: O P PAREEK O P PAREEK

टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) मीटर प्रत्येक शुक्रवार को टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट के माध्यम से इस बात का पता लगाती है कि किस चैनल को और किस कार्यक्रम को देखने के लिए सबसे ज्यादा दर्शक मिले। इसके आंकलन का पैमाना टीआरपी है। अर्थात् टीआरपी के माध्यम से यह पता चलता है कि किस दिन और कितना समय कौन-सा चैनल टीवी पर सबसे ज्यादा चला है। यह मी‍टर बड़े-बड़े शहरों में कुछ चुनिंदा घरों में लगाये जाते हैं जब उन घरों के सदस्यों द्वारा जिस प्रोग्राम को देख जाता है, तो टीआरपी मीटर में समय के साथ कार्यक्रम व चैनल का नाम भी सेव हो जाता है। इस विधि में आंकलन शुक्रवार को होता है, जिससे पता चलता है कि सोमवार से शुक्रवार शाम 8 से 9 बजे तक भारतीय टेलीविजन में सबसे ज्यादा स्टार प्लस देखा गया है। यह एक रेंडम एक्सि स मैंथड है जो अनुमान के तौर पर कार्य करता है यानि के किसी क्षेत्र का सर्वे करना हो तो उस क्षेत्र के कुछ चुनिंदा लोगों को ले लेते हैं और इससे अनुमान लगा लिया जाता है कि उस क्षेत्र के अमुमन सभी लोगों के विचार एक से होगें, प्रतिक्रिया के लिए धन्यिवाद

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा:

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

के द्वारा: अंशुमाली रस्तोगी अंशुमाली रस्तोगी

के द्वारा: Gajendra Pratap Singh Gajendra Pratap Singh

के द्वारा: Mala Srivastava Mala Srivastava

के द्वारा: jai jai




latest from jagran