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दास्तान-ए-महिला उत्पीड़न

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‘बेटी’ शब्द जिसका नाम सुनते ही अधिकांश लोगों के चेहरे की हवाईयां उड़ जाती हैं, मानों कोई बुरी ख़बर से पाला पड़ गया हो? यह तो मात्र नाम का ही प्रभाव है। अगर वास्तविकता के धरातल पर बात करें तो किसी के घर में बेटी के जन्म लेते ही (वो भी पहली) उस घर में मातम-सा छा जाता है। जैसे उसके घर में कोई जनमा नहीं, अपितु कोई मर गया हो। वहीं बच्ची को जन्म देने वाली बेबस मां और अबोध बच्ची दोनों के साथ बुरा बर्ताव देखने को मिलने लगता है। जैसे बच्ची के जन्म लेने से उस घर के ऊपर कोई मुसीबत का पहाड़ गिर पड़ा हो, और सारी-की-सारी गलती उस जन्म देने वाली मां पर थोप दी जाती है। जिसकी कहीं कोई गलती नहीं होती। इसके बाद भी उससे कहा जाता है कि बेटी को जना है तूने, अब खुद संभाल इसको। और छोड़ देते हैं दोनों को अपने हाल पर। न कोई चिंता, न ही फिकर, मरे चाहे जीए। यह किसी एक घर की दास्तान नहीं, बल्कि पूरे समाज में फैली एक कुबुराई है जिसे लोगों आज भी अपने समाज में जिंदा किए हुए हैं। क्योंकि यह विकृत समाज की सोच का ही नतीजा है जिसकी झलक आज भी देखने को मिल रही है।
जैसा कि विदित है कि भारत के कुछ राज्यों में यह स्थिति और भी भयावह रूप में हमारे समक्ष दिखाई देती है। जहां बेटी के पैदा होते ही मार देने की परंपरा अब भी मौजूद है। कभी दूध के टब में डुबोकर, कभी अफीम खिलाकर, तो कभी तकीए से उसका गला दबाकर या फिर जन्म देने वाली दाई को चंद रुपए देकर मारवा दिया जाता है। वैसे यह कु-प्रथा भारत के उन राज्यों में आज भी अधिक प्रचलित है। जहां सदियों से बेटियों को बेटों के कमतर समझा जाता है। वहीं सभ्य परिवारों व शिक्षित समुदाय की बात करें तो वहां स्थिति कुछ ठीक-ठाक है बस ठीक-ठाक। क्योंकि सभ्य और शिक्षित लोग बच्ची को पैदा होते ही नहीं मारते अपितु, उस बच्ची को पैदा ही नहीं होने देते। मां के गर्भ में ही लिंग का पता लगाकर मारवा देते हैं।
इस संदर्भ में आगे बात करें तो पहले और दूसरे समाज में मात्र एक ही असमानता दिखाई देती है कि पहला समाज पैदा होने के बाद तो दूसरा पैदा होने से पहले, और समानता यह कि, बच्ची को मारना ही है। चाहे जैसे भी हो, यदि बच्ची पैदा हुई है या होने वाली है उससे पहले ही उसका नामों-निशान मिटा देते हैं, अपने परिवार से। हां कुछ लोग पहली बच्ची के पैदा होते ही कुछ कारणों से बच्ची को नहीं मारते, क्योंकि वह यह सोचकर सब्र कर लेते हैं कि चलो दूसरा बेटा होगा। अगर फिर बेटा नहीं हुआ बेटी ही हुई तो उसके साथ भी वो ही किया जाता है जो अधिकांश लोग करते हैं या करते आ रहें हैं। वैसे यह किसी राज्य या किसी तबके, समुदाय, जाति की बेटियों के साथ घटित होने वाली घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की बेटियों की मार्मिक दास्तान है। जिसके आंकड़े हम सरकार की रिपोर्टों और मीडिया में प्रसारित ख़बरों के माध्यम से अंदाजा लगा सकते हैं कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के अनुपात की वास्तविक स्थिति क्या है।
वैसे बेटियों के साथ घटित घटनाओं की दास्तान इसके अलावा कुछ और भी कहानी बयां करती है कि कुछ बेटियों के मां-बाप उनको पैदा होते ही नहीं मारते, तो उनके साथ परिवार के लोग खान-पान, रहन-सहन, पढ़ाई-लिखाई आदि सब में भेदभाव करते हैं। जिसके तर्क में हमेशा से यह कहा जाता है कि, आखिर जाना तो पराए घर ही है, पढ़-लिख कर क्या कलेक्टर बनेंगी? करना तो इसको झाडू-पौंछा ही है। इस तरह पग-पग पर उसकी हमेशा उपेक्षा की जाती है। इतना झेलने के उपरांत भी इन बेटियों के उत्पीड़न के सिलसिलों का अंत यहीं नहीं ठहरता, उसको या तो किसी के हाथों बेच दिया जाता है, या किसी बूढ़े के साथ उसका विवाह कर दिया जाता है। कहीं-कहीं समाज में तो छोटी उम्र में ही धर्म के नाम पर मंदिरों में दान तक कर दिया जाता है। जहां पर धर्म के पुजारी इनको भोगकर वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल देते हैं। जहां लोग अपनी हबस की पूर्ति हेतु इनके जिस्मों का सौदा करके, इनके जिस्मों को हर दिन रौंदते हैं। इन सब के बावजूद भी बेटियों को कभी दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, तो कभी आग में जलाकर मार दिया है। कभी-कभी तो बर्दास्त से बाहर हो चुकी पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए खुद जलकर मरना पड़ता है। यह कोई सती प्रथा नहीं जहां पति की मौत के बाद समाज के दबाव में आकर पति की चिता के साथ जलना पड़ता था। जिसे सती प्रथा करते थे, परंतु अब यह प्रथा समाज से खत्म हो चुकी है इसकी जगह बहू-बेटी को जलाकर मारने की प्रथा अब मुखर हो चुकी है। और-तो-और उस दहेज की मांग पूरी न करने के एवज में पग-पग पर प्रताड़ित किया जाता है, लातों-घूसों से पति व सास-ससुर द्वारा मार-पीटा जाता है। इतने से ही हमारे समाज का बेहशीपन शांत नहीं होता, इन बेटियों के प्रति, तो समाज के ठेकेदार, विकृत मानसिक प्रवृत्ति के कुंठित लोग और-तो-और आपसी संगे-संबंधी कहीं पर तो घर के ही सदस्यों द्वारा इनके साथ बलात्कार की घटना को अंजाम दिया जाता है। जिस करण वो पूर्णतः टूट जाती है तथा समाज में मुंह दिखने के लायक नहीं बचती। वहीं समाज, बलात्कार के दोषियों को सजा दिलाने की तुलना में सारा दोष उस वेबस पीड़ित लड़की पर मड़ देते हैं। जो अपने साथ हुई बलात्कार की घटना से तिल-तिल कर मर रही है। इस प्रकार का उत्पीड़न महिलाओं के साथ होना प्रतिदिन की घटना में शुमार हो चुका है।
इतने सारे उत्पीड़न को झेलते हुए महिलाएं आज स्वयं के महिला होने पर अधिक चिंता में है, क्योंकि लोकतंत्र के चारों स्तंभ कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और यहां तक की मीडिया भी इन पर होने वाले अत्याचारों से इन्हें मुक्ति दिला पाने में नकारा साबित हो रहें है। इसका मूल कारण के पीछे सिर्फ-और-सिर्फ हमारा पुरुष प्रधान समाज ही है, तभी तो पीड़िता को कभी परिजन अपने परिवार के मान-सम्मान की खातिर, तो कभी दबंगों द्वारा डरा-धमकाकर शांत करा दिया जाता है। अगर कुछ एक महिलाएं हिम्मत करके अपने साथ हुए अत्याचारों की रिपोर्ट दर्ज करवाती भी हैं तो वहां भी उसे पुलिस द्वारा बदसलूकी का दंश झेलना पड़ता है। क्योंकि पुलिस कभी रुपयों के लालच में, तो कभी बाहुबलियों के दबाव के चलते, और-तो-और अधिकांशतः पुलिस वाले अपने क्षेत्र में होने वाले अपराधों में कमी दिखाने के चलते ऐसी प्रवृत्ति का इस्तेमाल करते रहते हैं। यदि पुलिस किसी दबाव के चलते रिपोर्ट दर्ज कर भी लेती है तो वह केस की ठीक से विवेचना करने में भी अपना ठुलमुल रवैया दिखाने से बाज नहीं आते। इसके साथ-साथ न्याय व्यवस्था में न्याय पाने के लिए उसे वर्षों अपने साथ हुए अत्याचारों के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, इसके बावजूद भी न्याय मिल जाए इसकी कोई गारंटी नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे समाज की रंगों में खून बनकर दौड़ने लगा है। वहीं पुलिस वाले चंद रुपयों के एवज में पूरे केस का रुख ही पलटकर रख देते हैं। बलात्कार के मामलों को छेड़छाड़, दहेज हत्या के मामलों को आत्महत्या, वेश्यावृत्ति में धकेली गई महिला का वेश्या और घरेलू हिंसा को पत्नी की बदचलनी में तब्दील करके दिखा दिया जाता है। वहीं पीड़िता महिला अपने साथ हुए अत्याचारों को बताते-बताते व न्याय की गुहार लगाते-लगाते मर जाती है और उसे न्याय नहीं मिलता।
अगर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों को मीडिया के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कुछ एक अपवाद स्वरूप मामलों को छोड़कर लगभग सभी मामलों को वह केवल-और-केवल सनसनीखेज़ ख़बरों के रूप में इनका इस्तेमाल करता है यानि प्रकाशित/प्रसारित करने का काम करता है। बहुत बार तो यहां तक देखने को मिलता है कि मीडिया महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों को, खासतौर से बलात्कार संबंधी मामलों को कालपनिक दृश्यों के रूप में बार-बार दिखाने का काम करता है, यानि उस महिला के साथ मीडिया भी बार-बार बलात्कार की घटना को अंजाम देता है। क्योंकि बलात्कारी उस महिला के साथ शारीरिक बलात्कार करता है तो मीडिया उस महिला का मानसिक बलात्कार करता है। वैसे यह बात गलत नहीं है कि मीडिया महिलाओं के साथ हुए शोषण व अत्याचारों को एक ख़बर के रूप में देखता है कि चलो एक अच्छी ख़बर तो हाथ लगी। जिस ख़बर से को बार-बार दिखाने से हमारे चैनल की टीआरपी तो थोड़ी बढे़गी। और अगर हम पीड़िता को न्याय दिलाने की बात करें तो यह इनसे परे की बात है। क्योंकि यह सिर्फ-और-सिर्फ शहरी और बड़े वर्ग या यहां भी कहना गलत नहीं होगा कि यह सिर्फ धनाढ्य वर्गों और उच्च जाति की महिलाओं के साथ हुए शोषण की ख़बरों को ही ज्यादा तबज्जों देते हैं, उसको न्याय दिलाने के लिए ख़बरों का लगातार फोलोअप भी करते रहते हैं। ताकि पुलिस व प्रशासन पर दबाव बनाकर जल्द-से-जल्द दोषियों को सजा दिला सकें। क्योंकि वह पीड़ित महिला उच्च व धनाढ्य वर्ग से तालुक रखती हैं। वहीं गरीब तबके और छोटी जाति की महिलाओं के साथ हुए अत्याचार व शोषण से इनको कोई सरोकार नहीं होता, क्योंकि वह इनके लिए न तो ख़बर का काम नहीं करती है और न ही वर्ग विशेष का। वैसे अब मीडिया भी इन महिलाओं का उत्पीड़न करने लगा है। जिसका उदाहरण हम आए दिन पूरे मीडिया में देखते रहते हैं कि किस तरह वह उद्योगपतियों द्वारा निर्मित किसी भी वस्तु को बाजार में बेचने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करता रहता है, वो भी उसको अर्द्धनग्न करके, कभी-कभी तो पूर्णतः नग्न करके। इस नग्नता भरे विज्ञापनों को वह समाज के सामने परोस देता है। जिसको देखकर हमारा पुरुष महिलाओं को सिर्फ कामुक व भोग्या की दृष्टि मात्र से देखने लगते हैं। जिससे कहीं-न-किसी महिलाओं को अपनी अस्मत लूटने का खतरा बना रहता है।
अतः में महिला उत्पीड़न की पूरी दास्तांन पर प्रकाश डाला जाए, और महिलाओं की स्थिति का आंकलन किया जाए, तो वास्तविक स्थिति हमारे सामने स्वतः ही आ जाएगी कि, महिलाओं को पहले तो पैदा ही नहीं होने दिया जाता, यदि पैदा हो भी गई तो पुरुष प्रधान समाज द्वारा उसके पग पर इतने कांटें बो दिए जाते हैं ताकि वह पुरुष प्रधान समाज के समतुल्य खड़ी न हो सके और उसकी ता-जिंदगी लहुलुहान तरीके से ही व्यतीत हो। तभी तो वह बार-बार सिर्फ यही कहने को मजबूर होती है कि ‘‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजों’’।

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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aksingh के द्वारा
July 22, 2013

मीडिया बलात्कार मामलो को चटकारे के साथ पेश करती है (मीडिया का सक्रिय होना अच्छी बात है किन्तु इस तरह नहीं)  हद तो तब हो जाती है जब वे नाट्य रूपांतरण दिखाते हैI

aksingh के द्वारा
July 22, 2013

26/11 में मीडिया ने टीआरपी बढ़ाने के लिए जो लाइव टेलीकास्ट किया वो अक्षम्य है,क्यूकि ऐसा कर के मीडिया ने आतंकियो का ही सहायता किया थाI

vaidya surenderpal के द्वारा
June 17, 2013

गजेन्द्र जी, महिला उत्पीड़न के विषय को सही ढंग से उठाया है आपने। बैस्ट ब्लागर चुने की हार्दिक बधाई।

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 18, 2013

    सुरेंद्र जी धन्‍यवाद आप सभी के मार्ग दर्शन से संभव हो पाया है

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 17, 2013

प्रिय गजेन्द्र जी, सबसे पहले आपको मेरी तरफ से ” बेस्ट ब्लोगर ” चुनने के लिए बहुत बहुत बधाई! सार्थक लेख …महिला उत्पीडन के कारक दिखाता और जागृत करता हुआ सुन्दर लेख …काश लोग इन पहलुओं पर ध्यान दें समाज को बचाएं … भ्रमर ५

jlsingh के द्वारा
June 16, 2013

आदरनीय गजेन्द्र जी, सबसे पहले आपको मेरी तरफ से ” बेस्ट ब्लोगर ” चुनने के लिए बहुत बहुत बधाई! गजेन्द्र जी, मैं भी आदरणीय अशोक दूबे जी के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ, इसके अलावा अपने देश की न्याय ब्यवस्था को भी मैं दोषी मानता हूँ. सभी चर्चित कांडों को सिर्फ चर्चित बनाकर, त्वरित अदालतें बनाकर तत्काल मामले को रफा दफा कर दिया जाता है, और फिर शुरू हो जाती है धीमी रफ़्तार के साथ चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया. अगर इन अपराधियों को जल्द और कठोर सजा दे दी जाय जो जग जाहिर भी हो तो शायद इन अपराधों पर अंकुश लग सके! बहरहाल सामयिक आलेख लिखने के लिए पुन: अभिनन्दन! जागरण को गलती सुधारनी चाहिए, वो तो कुमारेन्द्र जी ने यहाँ जाहिर कर अपने लेखकीय धर्म का पालन किया है! उनका भी अभिनन्दन!

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 17, 2013

    सिंह साहब प्रतिक्रिया हेतु धन्‍यवाद

Manisha Singh Raghav के द्वारा
June 15, 2013

गजेन्द्र जी , सबसे पहले आपको मेरी तरफ से ” बेस्ट ब्लोगर ” चुनने के लिए बहुत बहुत बधाई । गजेन्द्र जी मैं आदरणीय अशोक दूबे जी के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ । अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ने में बिलकुल भी बुद्धिमानी नहीं । आप मेरा लेख ” बीड़ा कौन उठाये ” जरुर पढ़ें और मुझे इस लेख के बारे में जरुर बताएं । मैं इंतजार करूंगी और कुछ भी कहिए पर आप तो मर्द हैं कम से कम नारी की गलतियों का जिम्मेदार पुरुष समाज को मत ठहराइये ।

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 17, 2013

    मनीषा जी बात मर्द और औरत वाली कदापि नहीं है बिना औरत के पुरूष ओर बिना पुरूष के औरत अधूरी ही है। और मैं किसी का ठीकरा किसी के सिर पर फोडने की कोशिश नहीं कर रहा हूं मैं तो औरत की वास्तिवक स्थ्‍िति से सबको अवगत कराने की कोशिश कर रहा हूं। प्रतिक्रिया हेतु धन्‍यवाद

priti के द्वारा
June 14, 2013

बेस्ट ब्लोगर चुने जाने के लिए हार्दिक बधाई गजेन्द्र जी ,अपने आलेख में आपने महिला उत्पीडन के हर पहलू को छुआ है ,सार्थक पोस्ट के लिए पुनः बधाई !

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 15, 2013

    प्रीति जी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार

aman kumar के द्वारा
June 14, 2013

बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर हार्दीक बधाई | आपका लेख बिलकुल सही और स्पष्ट स्थिति दर्शाता है

Kumarendra Singh Sengar के द्वारा
June 14, 2013

बधाई, आज (१४ जून २०१३) को आपकी ये पोस्ट के अंश का प्रकाशन दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर किया गया है पर गलती से वो हमारे नाम से प्रकाशित हुआ है. आपको सुन्दर लेखन के लिए बधाई.. बेटियों के प्रति जागरूकता अत्यावश्यक है…

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 14, 2013

    कोई बात नहीं महोदय, नाम में क्‍या रखा है सब भावनाओं का खेल है। प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्‍यवाद

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 13, 2013

    त्रिपाठी जी सही कहा अपने

Ayodhya Prasad Tripathi के द्वारा
June 13, 2013

ूासज

Abhishek के द्वारा
June 13, 2013

गंजेंद्र जी आपको बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर हार्दीक बधाई

ashokkumardubey के द्वारा
June 13, 2013

गंजेंद्र जी सबसे पहले आपको बेस्ट ब्लागर चुने जाने पर हार्दीक बधाई .महिला उत्पीडन के सम्बन्ध में आपने बहुत विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया है और यह आज की सच्चाई है सिर्फ! आपके एक विचार से मैं सहमत नहीं हूँ की यह सब पुरुष प्रधानता के चलते हो रहा है यह गुजरे ज़माने की बात आप कर रहें हैं पुरुष प्रधानता अपने देश में सदियों तक रही है पर आज कई शीर्ष पदों पर महिला भी काबिज हैं हाँ चुकी आबादी अपने देश की इतनी है की सबको समान सुविधा उपलब्ध नहीं है क्यूंकि साधन सीमित हैं जो सब तक पहुच नहीं रहे और उसपे भ्रष्टाचार भी हावी है और जहाँ तक महिलाओं के प्रति जुल्म की बात है तो आप भी जानते होंगे जायदातर महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन हैं कभी सास के रूप में कभी वैश्यावृति को चलाने के रूप में वैश्यावृति जिसको उनकी भाषा में चकला कहते हैं उसकी मालकिन हमेशा महिला ही होती है और सबसे गंभीर यह बात है की भ्रूण हत्या के लिए एक महिला ही तैयार हो जाती है वर्ना पुरुष कभी जोर जबरदस्ती से कन्या भ्रूण हत्या नहीं करने को विवश करता एक आध अपवाद को छोड़कर और ऐसी हत्यायें केवल इसलिए होती हैं क्यूंकि अपने हिन्दू विवाह कानून में सम्पति के अधिकार एक पुरुष को ही दिया जाता है उत्तराधिकारी अभी तक कोई महिला नहीं हुयी और एक वंश परमपरा की बात भी है लोग ऐसा मानते हैं लड़का नहीं हुवा तो मेरे वंश का क्या होगा? वह तो समाप्त हो जायेगा और अकूत सम्पति को कौन भोगेगा ऐसा ज्यादातर अमीर लोगों में होता है गरीब लोगों में इसलिए भी दोहरा ब्यवहार होता है क्यूंकि अपना समाज दहेज़ प्रथा में बुरी तरह उलझा है लड़की पैदा होते ही लोगों को उसके दहेज़ इकठ्ठा करने की चिंता सताने लगती है जिस दिन अपने समाज से दहेज़ प्रथा जैसी कुप्रथा समाप्त हो जाएगी ऐसे जुल्म भी महिलाओं एवं बेटियों पर नहीं होंगे ऐसा मेरा मानना है

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 13, 2013

    अशोक जी मैं आपकी बातों से पूर्णत: सहतम हूं, यदि मेरे लेख से संबंधित और भी कोई सुझाव व कमेंट हो तो अवश्‍य दीजिए, कोशिश करूंगा की आगे और भी अच्‍छा लिख सकूं। प्रतिक्रिया के लिए धन्‍यवाद

shalinikaushik के द्वारा
June 11, 2013

वैसे यह किसी राज्य या किसी तबके, समुदाय, जाति की बेटियों के साथ घटित होने वाली घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की बेटियों की मार्मिक दास्तांन है। एकदम सही कहा आपने .

    ashokkumardubey के द्वारा
    June 13, 2013

    शालिनी जी चुकी आप एक न्यायविद हैं मेरे कमेंट्स पर अपने विचार जरुर लिखेंगी धन्यवाद

    Dr. Gajendra Pratap Singh के द्वारा
    June 13, 2013

    शालिनी जी प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत साधुवाद

    priyanka के द्वारा
    June 17, 2013

    mujhe bhi blog likhna pasand hai plz mujhe bata de ki kasie starting hoti hai or kaise publish hote hai…… plz plz help me


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